Thursday, May 28, 2020

आप हनुमान चालीसा गाने में एक बड़ी गलती कर रहे हैं

धार्मिक ग्रंथों के पन्ने अनेक बार बिखर कर गलत क्रम में आगे पीछे हो गए - 1
हनुमान चालीसा


लेखक -- राजेन्द्र गुप्ता

मेरे ब्लॉग 'शब्दों का डीएनए' 'DNA OF WORDS' की मुख्य विषय वस्तु शब्दों में परिवर्तन है। इस ब्लॉग में शब्दों में वर्णों का क्रम बदल जाने से नए शब्द बनने के अनेक उदाहरण हैं। इसमें शब्दों में परिवर्तन के कारण कुछ धार्मिक कथाओं में अर्थ का अनर्थ होने के उदाहरण भी हैं। आज की पोस्ट शब्दों में बदलाव से हटकर है। यह दिखाती है कि कई बार पुस्तक के पृष्ठों के क्रम में बदलाव से भी ग्रंथों में गड़बड़ हुई है।

प्राचीन काल में धार्मिक ग्रंथ वृक्षों की छाल और पत्तों से बने पृष्ठों पर लिखे जाते थे। बाद में कागज
के पृष्ठों पर लिखे जाने लगे। इन पृष्ठों को आजकल की पुस्तकों 
की तरह जिल्द में नहीं बांधा जाता था। इन्हें क्रम में लगाकर डोरी से बांधकर कपड़े में लपेट कर रखा जाता था। किन्तु ऐसा लगता है कि अनेक बार यह पृष्ठ बिखर जाते थे और किसी गलत क्रम में बांध दिए जाते थे। गलत क्रम में आगे-पीछे होने से कई बार कथा का अर्थ और संदर्भ बदल जाता था। 

उदाहरण प्रस्तुत हैं।

1. हनुमान चालीसा
यह तुलसीदास जी रचित हनुमान जी की स्तुति है। किंतु 
बड़ी अजीब बात है कि इस हनुमान स्तुति से पहले एक दोहा गाया जाता है जिसमें कहा गया है कि अब मैं श्री राम की स्तुति शुरू करता हूँ!! 

“श्रीगुरु चरन सरोज रज
निजमनु मुकुरु सुधारि
बरनउँ रघुबर बिमल जसु
जो दायकु फल चारि।”
अर्थ -- “(तुलसीदास कहते हैं) श्री गुरु जी के चरण कमलों की धूल से मैं अपने मन रूपी दर्पण को साफ करके राम जी के उस विमल यश का वर्णन करूंगा जो (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूपी) चारों फलों का दायक है।
मूल रूप से यह दोहा तुलसीदास जी रचित श्रीरामचरितमानस में अयोध्याकाण्ड के आरंभ में मंगलाचरण श्लोकों के तुरंत बाद आया है। पूरे अयोध्याकाण्ड में और उसके बाद अरण्यकाण्ड में भी राम कथा में हनुमान जी का वर्णन नहीं है। हनुमान जी पहली बार किष्किंधाकाण्ड में आते हैं।

यह बहुत अटपटी बात है कि आप शुरू में कहें कि मैं राम जी का गुणगान करुंगा और फिर हनुमान जी का गुणगान करते रहें, रामजी की बात भी नहीं करें। हनुमान चालीसा की चालीसों चौपाइयों और अंतिम दोहे में हनुमान जी का गुणगान है, राम जी का नहीं।

बात साफ है कि “श्रीगुरु चरन सरोज रज" दोहे का हनुमान चालीसा से कोई संबंध नहीं है। ऐसा लगता है कि यह पृष्ठों के बिखर जाने और उन्हें गलत जगह लगा दिए जाने का परिणाम है। हनुमान चालीसा गाने से पहले "श्रीगुरु चरन सरोज रज" दोहा गाना गलत है।

अगली बार आप हनुमान चालीसा गाने से पहले केवल हनुमान जी के आह्वान से शुरू करिए --
" बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार" 

और फिर 
" जय हनुमान..............    

अगली बार -- आप '
श्रीरामचंद्र कृपालु भज मन' गाने में एक बड़ी गलती कर रहे हैं

Thursday, April 16, 2020

सूतक शब्द कहाँ से आया?

कोरोना वायरस महामारी के समय में सूतक शब्द की चर्चा है। ऐसा लगता है कि पूरी दुनिया को सूतक लगा है। सूतक संस्कृत का शब्द है। इसका मूल अर्थ है -- अपवित्रता / अशुद्धता / अशौच। इस शब्द का प्रयोग विशेष स्थितियों में परिवार वालों को होने वाली अशुद्धता के लिए होता हैजैसे 1. जननाशौच-- बच्चे के जन्म के समय या स्त्री के गर्भपात के कारण; 2. गाय के बच्चा देने पर; 3. मरणाशौच -- परिवार में किसी के मरने पर। 4. सूर्य या चंद्रमा का ग्रहण के समय।
हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार सूतक की अशुद्धता निश्चित अवधि के लिए रहती है। जैसे बच्चा पैदा होने पर 10 दिन और मृत्यु होने पर 12 दिन के लिए। सूतक के आरंभ होते ही घर में रखे हुए पानी और भोजन को अपवित्र मान कर फेंक दिया जाता है। परिवार जनों के द्वारा द्वारा अनेक वस्तुओं को छूना मना होता है। परिवार में धार्मिक क्रियाएं मना होती हैं। किसी को भी सूतक लगे परिवार के भोजन या पानी को छूना मना होता है। किसी की मृत्यु होने पर सूतक की अवधि में उस परिवार में भोजन बनाना भी मना होता है। गुल्लक में रुपया डालने भी मना है। आधुनिक युग में अधिकतर परिवारों में व्यावहारिक कारणों से सूतक के निषेधों का पूरा पालन नहीं किया जाता। 
सूतक की अवधि समाप्त होने पर घर की शुद्धि के लिए औषधीय वनस्पतियों की हविषा दे कर हवन किया जाता है।

ऐसा मानने के पर्याप्त कारण हैं कि प्राचीन काल में सूतक प्रथा आरंभ करने के पीछे संक्रमण रोकने के लिए जन स्वास्थ्य की नीति रही होगी।

सूतक शब्द का उत्स एक रहस्य है। संस्कृत व्याकरण के नियम के अनुसार सूतक शब्द का उत्स सूत होना चाहिए
सूत > सूतक
  
सूत के अनेक अर्थ हैंजैसे 1. जन्मा हुआउत्पन्न। 2. सारथी अर्थात रथ चलाने वाला। 3. बंदीजन। 4. सूर्य। 5. पारा।

सूत शब्द का कोई भी अर्थ सूतक प्रथा में अंतर्हित छुआ-छूत की भावना को नहीं छूता। सूत शब्द के इन विभिन्न अर्थों में कुछ भी समानता नहीं है। अतः इन सभी अर्थों के लिए सूत शब्द के अनेक उत्स होने चाहिए। 

मेरा प्रस्ताव है कि सूतक शब्द छूत पर आधारित शब्द छूतक का अपभ्रंश है। मूल छूतक शब्द विलुप्त हो चुका है। 

छूत > छूतक > सूतक 

सूतक का सूत से कोई संबंध नहीं है। 

आपका क्या विचार हैक्या आप सहमत हैंआपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।    




Saturday, March 07, 2020

बाज और घोड़ा के लिए एक जैसे शब्द -- श्येन, बाज, बाजि, वाजिन, वेगिन

लेखक -- राजेन्द्र गुप्ता

पिछली पोस्ट से जारी... 
पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा कि संस्कृत में विजेता के लिए जयेन शब्द भी है। उसी से श्येन शब्द निकला जिसका प्रयोग बाज पक्षी के लिए हुआ। संस्कृत में एक विशेष प्रकार के घोड़े को भी श्येन कहते हैं। किन्तु घोड़े और बाज के लिए एक ही शब्द का प्रयोग यही नहीं रुकता। संस्कृत में बाजि शब्द का प्रयोग घोड़े के लिए भी होता है। शायद बाजि शब्द का उत्स गति के लिए वाज शब्द में है। वाज और बाज लगभग एक समान शब्द हैं।  
वाज / बाज शब्द भी वेग अर्थात गति का तद्भव रूप हो सकता है। 
वेग > वेज > वाज > बाज
संस्कृत में श्येन। बाज को वेगिन् भी कहते हैं।
वेग > वेगिन् । अतः वेगिन का अर्थ हुआ गतिमान।  
प्राणियों में तीव्र गति के लिए प्रसिद्ध घोड़े को संस्कृत में वाजिन् भी कहते हैं। घोड़े के लिए वाजिन और बाज के लिए वेगिन, दोनों शब्द सगे संबंधी है!
वेगिन् > वागिन > वाजिन
बाजि - तुलसीदास जी ने रामचारित मानस में अनेक स्थानों पर घोड़े के लिए बाजि शब्द का प्रयोग किया है। बाजि भी बाज, वेगिन और वाजिन का संबंधी है।
संस्कृत में बाज का एक और पर्यायवाची शब्द पाजिक है। यह भी वेग पर ही आधारित है। जैसे वेग से वेगिन, वैसे ही वेग से वेगिक। वेगिक > बेजिक > बाजिक > पाजिक।  
या फिर बाज > बाजिक > पाजिक 
बाज के लिए अंग्रेजी का हॉक hawk भी वेग का ही बिगड़ा रूप लगता है। 
वेग
> वेक > एवक > हवक > ह्वाक
या फिर वेग > ह्वेग > ह्वेक > ह्वाक > हॉक hawk
शिकारी पक्षी होने के कारण बाज को शिकरा भी कहते हैं। 
शिकारी > शिकारा > शिकरा     
संस्कृत में श्येन / बाज के लिए अनेक अन्य शब्द भी हैं जो अपनी कहानी स्वयं कहते हैं, जैसे मारक (मारने वाला), खगान्तक (पक्षियों का अंत करने वाला), कपोतारि (कबूतरों का शत्रु) तथा शशघ्नी (खरगोश मारने वाला)। 

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Wednesday, March 04, 2020

शाहीन बाग़ का शाहीन शब्द कहाँ से आया?



लेखक -- राजेन्द्र गुप्ता
भारत में राजधानी
दिल्ली की शाहीन बाग कॉलोनी में लंबे समय से सरकार विरोधी धरना-प्रदर्शन चल रहा है। इस कारण, आजकल शाहीन शब्द सबके मुँह पर है। शाहीन फ़ारसी भाषा का शब्द है। इसका अर्थ है बाज पक्षी। एक समाचार के अनुसार कॉलोनी बनाने वाले ने इसका नाम अल्लामा इकबाल की प्रसिद्ध नज़्म ‘सितारों से आगे जहाँ और भी हैं’ की एक पंक्ति से लिया था–
“तू शाहीन है, परवाज़ है काम तेरा, तेरे सामने आसमान और भी हैं” (परवाज़ = उड़ान)। किन्तु जिज्ञासा है कि बाज के अर्थ में शाहीन शब्द फ़ारसी में कहाँ से आया? चलिए शाहीन शब्द के डीएनए/ DNA की जाँच करते हैं। इससे हमें इस शब्द के उत्स और रिश्तेदारियों का पता चलेगा। हिन्दी, पंजाबी, बांग्ला आदि अनेक भारतीय भाषाओं की तरह ही फ़ारसी भी संस्कृत से निकली है। इसमें संस्कृत के तद्भव शब्दों की भरमार है। शाहीन या बाज के लिए संस्कृत में निकटतम शब्द श्येन हैं। अतः फ़ारसी का शाहीन संस्कृत के श्येन का ही तद्भव रूप है। श्येन > शयेन > शहेन > शहीन > शाहीन। 
अब प्रश्न उठता है कि संस्कृत में श्येन शब्द कहाँ से आया?हमारे पुरखे कभी किसी व्यक्ति, प्राणी या पौधे का निरर्थक नाम नहीं रखते थे। निश्चय ही श्येन या बाज के सभी मूल नाम गुणवाचक ही रहे होंगे। श्येन एक शिकारी पक्षी है। इसे सबसे अच्छा ‘फ्लाइंग मशीन’ कहा जाता है। यह आकाश में 4000 मीटर या लगभग 12000 फीट की उंचाई तक उड़ान भर सकता है। यह आसमान का सबसे तेज पक्षी है जो शिकार पर झपट्टा मारने के लिए 320 किमी प्रति घंटे से भी अधिक गति से गोता मार सकता है। बाज, सबसे तेज ही नहीं, सबसे शक्तिशाली पक्षी भी है। बाज के तेज और नुकीले पंजों और मजबूत चोंच से कोई भी शिकार नहीं बच सकता। निश्चय ही बाज आकाश का विजेता है, राजा है। प्राचीन काल में शिकार और युद्ध में भी इसका प्रयोग होता था।  

युद्ध के लिए बाज पालने के कारण गुरु गोबिन्द सिंह को ‘बाजाँ वाला’ भी कहा जाता है। गुरु गोबिन्द सिंह जी ने लिखा -- चिड़ियों से मैं बाज लडाउँ, गीदड़ों को मैं शेर बनाउँ। सवा लाख से एक लडाउँ, तभी गोबिंद सिंह नाम कहाउँ!! इस पद में बाज को विजेता का प्रतीक माना गया है। संस्कृत में विजेता को जयन या जयिन् भी कहते हैं। श्येन शब्द जयिन् का ही बिगड़ा रूप दिखता है।
जयिन् > शयिन > शयेन > श्येन। यह यात्रा फ़ारसी में भी जारी रहती है— श्येन > शयीन > शहीन > शाहीन
या फिर
जयिन् > शयिन > शहीन > शाहीन
वेद और पुराणों में हमारी सभ्यता के उद्गम और विकास की झलक मिलती है। संसार की सबसे प्राचीन पुस्तक ऋगवेद में गरुड़ पक्षी को श्येन कहा गया है। ऋगवेद में गरुड़/श्येन देव-लोक से सोम लेकर धरती पर आता था। गरुड़ सभी पौराणिक पक्षियों में सबसे बड़ा और सबसे शक्तिशाली है। गरुड़ भगवान विष्णु का वाहन है और इसे पक्षीराज की उपाधि दी गई है। अतः मेरा विचार है कि श्येन या जयेन शब्द मूल रूप से गरुड़ पक्षी के लिए ही प्रयोग होता था किन्तु गरुड़ के लुप्त होने के बाद बाज आदि अन्य शक्तिशाली पक्षियों के लिए प्रयोग किया गया। यह उसी तरह हुआ है जैसे सिंह / शेर के लुप्तप्रायः होने के कारण आजकल बाघ को भी शेर कहा जाने लगा है। और तो और आजकल देवी दुर्गा का वाहन भी सिंह /शेर न हो कर बाघ को दिखाया जाने लगा है!

विश्व में ज्यामिति का सबसे प्राचीन ग्रंथ बोधायन का शुल्बसूत्र है, इसके अनुसार यज्ञ की वेदी में समिधा को पंख फैलाए हुए श्येन के आकार में सजाया जाता था। इस यज्ञ वेदी को श्येनचिती (ज्योति > चयोति > चिति) कहते थे। 







उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी जिले के पुरोला गाँव में 2100 वर्ष पुरानी श्येनचिती यज्ञ-वेदी के पुरातात्विक अवशेष मिले हैं।
उतरप्रदेश में कौशांबी में भी एक पुरातात्विक स्थल का नाम श्येनचिती है। वेदव्यास के महाभारत और कामन्दक के नीतिसार के अनुसार युद्ध की एक व्यूह रचना को भी श्येन कहते हैं। क्या यह नाम जयन/जयिन व्यूह का बिगड़ा रूप है या इसका बाज से कोई संबंध है? अमरसिंह, हलायुद्ध और हेमचन्द्र के प्राचीन संस्कृत शब्दकोशों के अनुसार एक विशेष प्रकार के घोड़े को भी श्येन कहते हैं। मैं नहीं जानता कि यह श्येन कहलाया जाने वाला घोड़ा अश्वमेध यज्ञ द्वारा विश्वविजय के लिए निकला अश्व होता था या कोई और विशेष घोड़ा। क्या श्येनचिती विजय के लिए किए जाने वाले किसी अश्वमेश यज्ञ की वेदी होती थी? (जयिन ज्योति > श्येन चिती ?)। इसका उत्तर तो संस्कृत साहित्य के  विद्वान  ही दे सकेंगे।    

चलते-चलते, शाहीन से उपजे कुछ पाजी शब्द। शाहीन बाग के संदर्भ में सोशल मीडिया पर शब्दों से खेल करने वाले विद्वानों ने बहुत खिलवाड़ भी की है और अनेक नए अपशब्दों को  गढ़ा है। कुछ उदाहरण: - शाह-हीन बाग, श्वान बाग, दिशा-हीन बाग, तौहीन बाग। 

आपको यह पोस्ट कैसी लगी? बताना ना भूलिए।  





















Sunday, April 07, 2019

ब्रह्मपुत्र नहीं, ब्रह्मपुत्री बोलो – पूर्वी भारत की सरस्वती


भारतीय संस्कृति में नदियों को देवी के समान माना गया है। लगभग सभी नदियों के नाम स्त्रीलिंग-वाचक हैं। केवल कुछ अपवाद हैं, जैसे ब्रह्मपुत्र, सिन्धु, दामोदर और सोनभद्र। इन्हें नदी नहीं नद माना गया है। नदी स्त्रीलिंग है। नद पुल्लिंग है। नद अर्थात बहुत बड़ी नदी। नद का मूल अर्थ है -- नाद  करने वाला, शोर करने वाला। स्वाभाविक है कि यह प्रश्न उठेगा कि हजारों नदियों में से कुल तीनचार नदियों में ऐसा क्या है जो उन्हें नदी नहीं नद बनाता है। उत्तर है कुछ भी नहीं। ब्रह्मपुत्र, सिन्धु, दामोदर या सोनभद्र की प्रकृति किसी भी तरह अन्य किसी बड़ी नदी की प्रकृति से भिन्न नहीं है। तो फिर इनका नाम पुल्लिंग-वाची क्यों? ऐसा लगता है कि यहाँ कोई गलती हुई है। अगर इस गलती की जांच करनी है तो फिर यह जानना आवश्यक होगा कि इन नदियों का नामकरण कैसे हुआ होगा। पहले ब्रह्मपुत्र की बात करते हैं। ब्रह्मपुत्र का अर्थ है – ब्रह्मा का पुत्र। यह नाम क्यों और कैसे पड़ा होगा?  नदी में बहने वाले पानी की मात्रा के अनुसार, ब्रह्मपुत्र भारत की सबसे बड़ी नदी है। यह भारतीय भूभाग की दूसरी सबसे लम्बी नदी है; पहले स्थान पर सिन्धु है। ब्रह्मपुत्र विश्व की पंद्रहवीं सबसे लम्बी और पानी की मात्रा में नौवीं सबसे बड़ी नदी है। अनेक स्थानों में इसका पाट 20 किलोमीटर तक चौड़ा है! कहीं-कही पर यह नदी 120 मीटर तक गहरी है! निश्चय ही ब्रह्मपुत्र भारत की नदियों में नदीतमा है, अर्थात सबसे बड़ी नदी। ऋग्वेद के नदी सूक्त में सरस्वती नदी के लिए नदीतमाविशेषण प्रयोग हुआ है। ऋग्वेद में सरस्वती नदी को अम्बेतमा (सबसे बड़ी माँ) और देवीतमा (सबसे बड़ी देवी) भी कहा गया है। सरस्वती नदी प्रागैतिहासिक काल में उत्तर-पश्चिम भारत में बहती थी। यह महाभारत काल तक सूख चुकी थी और ऐसा मानने के पर्याप्त कारण है कि सरस्वती नदी के सूखने के बाद सारस्वत क्षेत्र में बसने वाले निवासी विस्थापित हो कर अनेक दिशाओं में चले गए।  इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि विस्थापित जन जहाँ-जहाँ भी गए उन्होंने वहाँ-वहाँ की नदियों को अपने पुराने क्षेत्र की नदियों का नाम दिया हो और नये नगरों को भी पुराने नगरों का नाम दिया हो। शायद इसी क्रम में सारस्वत क्षेत्र से विस्थापित लोगों ने जब पूर्वी भारत में सरस्वती जैसी एक और नदीतमा को देखा होगा तो उसका नाम भी सरस्वती रखना चाहा होगा। सरस्वती को ब्रह्मा की पुत्री माना गया हैं। अतः, सरस्वती का एक नाम ब्रह्मपुत्री भी है। शायद इसीलिए ही, पूर्व की इस सरस्वती को ब्रह्मपुत्री कहा गया होगा जो समय के साथ बिगड़ कर ब्रह्मपुत्र हो गया होगा। भारत के असम प्रदेश में बहने वाली इस ब्रह्मपुत्र को असमी जन ब्रोह्मोपुत्रो कहते हैं। चीन में ब्रह्मपुत्र को अनेक नामों से जाना जाता है। इनमें से एक नाम बुलामपुतेला (Bùlāmǎpǔtèlāभी है। यह चीनी भाषा में को बोलने के कारण हुआ है --  (ब्रह्मपुत्र > ब्ल्म्पुत्ल > बुलामपुतेला)। किन्तु विशेष बात यह है कि यह नाम बुलामपुतेला है न कि बुलामपुतेल (ब्रह्मपुत्रा का चीनी उच्चारण)। अंत में स्त्रीलिंग-वाचक है पुल्लिंङ्ग-वाचक नहीं।  
प्रसिद्ध कोशकार श्री अरविंद कुमार जी के अनुसार सही नाम ब्रह्मपुत्रा ही है. वे कहते हैं कि हर जगह उसे ब्रह्मपुत्र लिखा जा रहा है। ऐसा लिखने वाले समझते हैँ कि रोमन लिपि मेँ लिखे Brahmaputra का सही उच्चारण ब्रह्मपुत्र होना चाहिए... पुत्रा के अर्थ हैँ –बालिकाछोटी लड़कीकन्याबेटी। ब्रह्मपुत्रा का मतलब है ब्रह्मा की बेटी – यानी सरस्वती।

श्यामसुंदर दास के हिंदी शब्दसागर में पुत्रा का अर्थ लड़की, कन्या, बेटी, बालिका बताया गया है। किन्तु हिंदी या संस्कृत के किसी भी अन्य कोष में यह शब्द नहीं मिलता। अरविंद जी के अनेकों कोशों में भी नहीं। न ही यह प्रचलन में है। साहित्य में या लोक में बेटी के लिए पुत्रा शब्द के प्रयोग का कोई उदाहरण सुलभ नहीं है। पुत्री शब्द लगातार प्रचलन में रहा है। सभी शब्दकोशों में भी है। अतः ब्रह्मपुत्र, ब्रह्मपुत्रा और ब्रह्मपुत्री में से ब्रह्मपुत्री ही सर्वाधिक मान्य जान पड़ता है।

चलिए आज से, ब्रह्मपुत्र नहीं, ब्रह्मपुत्री बोलें!  


Wednesday, December 26, 2018

प्रयाग का अर्थ नदियों का बड़ा संगम


उत्तर प्रदेश में गंगा और यमुना के संगम क्षेत्र और उसके किनारे बसे नगर को प्रयागराज कहते हैं. प्रयागराज हिन्दुओं का बड़ा तीर्थ स्थान है. इसे बहुत पवित्र माना गया है. यहाँ कुम्भ मेला भी लगता है. ऐसा माना जाता है कि यह स्थान प्राचीन काल से यज्ञभूमि था. यज्ञ से सम्बंधित होने से यह स्थान याज्ञ कहलाया. याज्ञ शब्द बिगड़ कर याग बना और फिर उससे प्रयाग. मैं प्रयाग शब्द की इस व्युत्पत्ति से सहमत नहीं हूँ. मेरा अनुमान है प्रयाग शब्द का उत्स नदियों के संगम में ही छिपा होना चाहिए. प्रयाग एक बहुत बड़ा नदी संगम है, अतः बड़े के लिये संस्कृत शब्द बृह् और संगम के लिए एक अन्य संस्कृत शब्द योग को जोड़ने से हमें ‘बृह्योग’ शब्द मिलता है. संभवतः ‘बृह्योग’ ही बिगड़ बृह्याग, उससे पृय्याग, प्रय्याग और फिर प्रयाग बन गया होगा. ऐसा मानने का एक और कारण भी है.   
गंगा के उद्गम गंगोत्री से निकली छोटी सी जलधारा, अपने मार्ग में अनेकों छोटी-बड़ी जलधाराओं से मिलती है और उनके बार-बार संगम से लगातार बड़ा रूप लेती चली जाती है. इस क्रम में ऊंचे पर्वतों में गंगोत्री से बह कर हरिद्वार में मैदानी प्रवेश तक गंगा में सैंकड़ों नदी-नालों के संगम हैं जिनमें पांच बड़े संगमों को प्रयाग ही कहा जाता है. ये हैं,
1. विष्णुप्रयाग -- धौली गंगा तथा अलकनंदा नदियों का संगम  

2. नन्दप्रयाग  -- नन्दाकिनी तथा अलकनंदा नदियों का संगम  
3. कर्णप्रयाग  -- अलकनंदा तथा पिण्डर नदियों का संगम
4. रुद्रप्रयाग  -- मन्दाकिनी तथा अलकनंदा नदियों का संगम
5. देवप्रयाग -- अलकनंदा तथा भगीरथी नदियों का संगम. इसी संगम स्थल के बाद इस नदी को गंगा के नाम से जाना जाता है.

हरिद्वार से गंगासागर तक के मार्ग में गंगा में और भी अनेक नदियों का संगम होता है. इन सभी संगमों में सबसे बड़ा है गंगा और यमुना का संगम है. निश्चय ही गंगा और यमुना का मिलन संगमराज या प्रयागराज कहलाने का अधिकारी है.  



Wednesday, November 01, 2017

Madagascar मडगास्कर




Mid-ocean country Madagascar's name is a corrupted Sanskrit word that means Mid-ocean! 

महासागर के बीच में मडगास्कर द्वीप का नाम संस्कृत के शब्द मध्यसागर का बिगड़ा हुआ रूप है! 


मध्यसागर madhyasAgar [Sanskrit] = mid sea

मध्जसाकर madhjasAkar

मदगसाकर madgasAkar

मडगास्कर maDgAskar / Madagascar

Monday, October 30, 2017

Niagara Falls नियागरा झरना



निर्झर   nirjhara [Sanskrit] = waterfall > 
नियझर   niyajhara > 
नियगर   niyagara >
नियागरा   NIAGARA 

Saturday, July 22, 2017

हनुमान-1. बाल हनुमान ने उगते सूरज को खाया. -- एक अविश्वसनीय गाथा के बनने की कथा

Hanuman-1. Child Hanuman eats the rising Sun -- Making of an incredible legend  

भारतीय संस्कृति में हनुमान जी जैसा कोई दूसरा देवता नहीं हैं. हनुमान जी में अतुलित बल है. उनसे बड़ा गुणी कोई और नहीं है. वह ज्ञानियों में सबसे पहले ज्ञानी हैं. गोस्वामी तुलसी दास जी ने हनुमान जी की स्तुति में
 'हनुमान चालीसालिखा था. इसमें एक दोहा और चालीस चौपाईयां हैं. प्रतिदिन करोड़ों हिन्दू 'हनुमान चालीसाका पाठ करते हैं. इसमें एक चौपाई इस प्रकार है --

"जुग सहस्र जोजन पर भानु । लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥"

अर्थातसूर्य (धरती से) इतने योजन  की दूरी पर है कि उस पर पहुंचने के लिए एक हजार युग लग जाएं। उसी सूर्य को हनुमान जी ने एक मीठा फल समझकर निगल लिया (एक योजन = लगभग 12 किलो मीटर).

इस चौपाई को सुन कर या पढ़ कर, विज्ञान के विद्यार्थी के मन में आस्था और विज्ञान टकराते हैं. धरती से सूरज की दूरी 14 लाख 96 हजार किलोमीटर है. वहाँ तक कोई कैसे उड़ कर जा सकता हैसूरज का व्यास धरती के व्यास से 109 गुणा अधिक हैं. 14 लाख किलोमीटर व्यास वाले सूरज को कोई कैसे अपने हाथों में उठा सकता हैसूरज आग का गोला है. उसकी सतह का तापमान 5,505°C हैजो उबलते हुए पानी के तापमान से 505 गुणा अधिक गरम है! इतने गरम सूरज को कोई कैसे खा सकता हैविज्ञान के अनुसार यह असंभव है. आस्था के अनुसार संभव है. क्योंकि भगवान सर्वशक्तिमान हैंभगवान कुछ भी कर सकते हैं. भगवान किसी से कुछ भी करा सकते हैं. लेकिन आस्था की भी अपनी एक मर्यादा होती है. सूरजचाँदधरती और अन्य सभी पिंडप्रकृति के नियमों से ही चलते हैं. अवतार-वाद के अनुसार जब-जब भगवान धरती पर अवतार लेते हैंतब-तब वे स्वयं भी प्रकृति के नियमों के आधीन होते हैं. उनसे बंध जाते हैं. वे सभी काम मनुष्यों की तरह ही करते हैं. माँ की कोख से जन्म लेते हैं. रोते भी हैं. राम अवतार में अगर उनकी पत्नी का अपहरण हो जाता हैतब वह सर्वशक्तिमान भगवान होते हुए भी असहाय होते हैं. उन्हें सामान्य मनुष्य की तरह मरना भी होता है. कृष्ण-अवतार में तो वे एक शिकारी के हाथों मारे जाते हैं! निश्चय हीअगर कोई मनुष्य उड़ करहाथों में पकड़ कर सूरज को नहीं खा सकता तो फिर मनुष्य के अवतार में भगवान भी 
उड़ कर उसे नहीं खा सकते. ठीक है. मान लिया. तब प्रश्न उठता है कि बाल हनुमान के द्वारा सूरज को खाने की कहानी कहाँ से आयीचलिये पता करते हैं. लेकिन इसके लिए आज एक बार फिरहमें पुरखों के साथ एक नयी यात्रा पर चलना होगा. एक निराली स्वप्निल दुनिया में. प्राचीन काल के एक वन में जहाँ बाल हनुमान अपने मित्रों के साथ भोजन के लिए फलों की खोज में घूम रहे हैं. लेकिन इस यात्रा पर चलने से पहले हमें अपना दृष्टिकोण साफ़ करना होगा.   

हमारी पौराणिक कहानियाँवास्तव मेंहमारी सभ्यता और संस्कृति के उदय और उसके विकास की कहानियाँ हैं. इनमेंहमारे वनवासी घुमंतू पुरखों का वर्णन है. वे पशुओं को पालतू बनाते हैं. वनवासी जीवन छोड़ कर फलों की बागबानी और पशु चराने का काम करते हैं. फिर खेती करते हैं. गाँव और नगर बसाते हैं. वेद-पुराणों में हमें भोजनबर्तनोंउपकरणोंवाहनोंऔर हथियारों के क्रमिक विकास का विवरण भी मिलता है. पुराणों की कहानियों में हम विज्ञानतकनीकी और दर्शन शास्त्र के विकास की झलक भी पातें हैं. हजारों वर्षों से हमारे पूर्वजों की सैंकड़ों पीढ़ियों ने अपने बच्चों को उन प्राचीन घटनाओं के विषय में कहानियों के माध्यम से ही बताया है. कहानियों को रोचक बनाने के लिएपुरखे कुछ बातें अपनी कल्पना से भी जोड़ते रहे हैं. इन हजारों वर्षों में शब्दों के उच्चारण में भी बदलाव होते गए. अतः कहानियों के मूल शब्द बदलते गए और उसके साथ अर्थ भी बदलते गए. इस कारणपुराणों की अनेक कहानियाँ का मूल अर्थप्राचीन काल में आँखों-देखी घटनाओं के वर्णन से पूरी तरह से बदल गया. यह कहानियाँ  विचित्र और असंभव घटनाओं से भर गयीं. पुराणों की कहानियों पर इसी दृष्टिकोण को लेकर आज की यात्रा शुरू करते हैं. कहानी पढ़ते समय कृपया मोटे अक्षरों वाले शब्दों को याद रखिये. सारा रहस्य इन्हीं शब्दों में छिपा है.  
  
एक घना वन. उसके बीच से निकलती एक नदी. वन के ठीक बाहरनदी किनारे एक विशाल लोक बसा हुआ हैं. इस लोक के लोग खेती नहीं करते. फलों की बागबानी करते हैं. सभी के पास फलों की अपनी फलबाड़ी हैं. अधिकतर पेड़ों पर गर्मी के मौसम में ही फल लगते हैं. प्रतिदिन भोजन के बाद जो फल बच जाते हैंउन्हें सुखाया जाता है. इन्हीं सूखे फलों को वर्ष के बाकी मौसमों में खाया जाता है. जैसे आम को सुखा कर बनाया गया आम-पापड़. फलों की अधिकता के कारण इस लोक को फललोकफलबाड़ी, या फलपुर भी कहा जाता है. लेकिन भिन्न उच्चारण के कारणकुछ लोग  इस बस्ती को आफल-लोकआफलपुर या आफलबाड़ी भी कहते हैं. उसी तरह जैसे कि पूर्वांचल के लोग स्थाई को अस्थाई और स्पष्ट को अस्पष्ट कहते हैं! लेकिन, हो सकता है कि फलों की अधिकता को दिखाने के लिए फलबाड़ी को आफलबाड़ी कहा जाता हो!  यहाँ के राजा को सभी लोग राज्यन (राज > राजनराज्य > राज्यन) कहते हैं. आफलबाड़ी के लोग अपने उद्यानों की जी-जान से रक्षा करते हैं. उन्हें आफलबाड़ी के पास के वन में रहने वाले वनवासियों से हमेशा खतरा रहता है. आफलबाड़ी वाले वनवासियों को वानर कहते हैं (वन से वानर). आफलबाड़ी में कालेगोरेपीले आदि अनेक रंगों के लोग रहते हैं. पर सभी वानरों (वनवासियों) का रंग बन्दर के रंग जैसा भूरा है. संस्कृत में बन्दर जैसे भूरे या ताम्बे जैसे भूरे रंग को कपिल कहते हैं. शायद तांबे के लिए अंग्रेजी में कॉपर copper शब्द संस्कृत के कपिल शब्द से ही बना होगा. अतः भूरा रंग होने के कारण आफलबाड़ी वाले वानरों को 'कपिलभी कहते हैं. वानर लोग आफलबाड़ी के लोगों को 'आफल' कहते हैंयानी जिनके पास फलों की अधिकता हो. वानरों ने अभी फलबाड़ी लगाना नहीं सीखा है. वे वन के कन्द-मूल-फल और जंतुओं पर ही निर्भर हैं. जब कभी वन में फलों की कमी होती हैतब वानर-टोली आफलबाड़ी के उद्यानों में घुस जाती है. इसलिए आफलबाड़ी के उद्यानों में रखवालों को नियुक्त किया गया है. उनके प्रमुख मारक वीर का नाम मार्त्य है. आफलबाड़ी और वनवासियों का रिश्ता केवल फलों की चोरी और रखवाली का नहीं है. आफलबाड़ी के पुरुष अनेक वानर बच्चों के पिता बन चुके हैं. जैसेराजा राज्यनएक वानरी अरूणा के बड़े पुत्र का पिता है. सूर्य नामक एक प्रबुद्ध नागरिक अरुणा के छोटे पुत्र का पिता है. वीर सैनिक मार्त्य, अञ्जना नाम की वानरी के बच्चे का पिता है. आफलबाड़ी में बच्चों को पिता के नाम से जाना जाता हैजैसे राज्यन का पुत्र राज्यनज  या राज्यनयसूर्य का पुत्र सूर्यज या सूर्यय. मार्त्य का पुत्र मार्त्यज. किन्तु वानर टोले में बच्चों को माता के नाम से ही जानते हैं. अतः अञ्जना और मार्त्य के बच्चे को सभी लोग आञ्जनेय या अञ्जनापुत्र कहते हैंऔर अरुणा के बच्चों को आरुणेय. लेकिन अरुणा के तो दो बेटे हैं, दोनों को आरुणेय कहने से भ्रम होता है. इसीलिए जन्म से ही मोटे और बलशाली बड़े बेटे को बली आरुणेय कहते हैं.   

आज हम वानर टोली के साथ हैं. यहाँ कई दिनों से लगातार बरसात हो रही है. कोई पुरुष कन्द-मूल-फल की खोज में नहीं जा पाया है. बच्चे कई दिनों से भूखे हैं. भूख के कारण किसी को रात भर नींद नहीं आई. आज सुबह होने से पहले ही बादल छंट गये हैं. सभी अपने आश्रय से बाहर निकल पड़े हैं. रात भर बरसात के बाद सभी जगह पानी भरा हैं. कीचड़ में कन्द-मूल-फल की खोज में वन में भटकने का कोई लाभ नहीं होगा. तय होता है कि फलदार आफलबाड़ी पर धावा बोलना चाहिए. वानरों की टोली आफलबाड़ी की ओर बढ़ती हैं. पुरुष अपने साथ लड़कों को भी ले जा रहे हैं. छोटे लड़कों को आसानी से बाड़ी की बाड़ में से अन्दर घुसाया जा सकता है. लड़कों में बलशाली बली और आरुणेय भी हैं. चंचलनटखट और बिजली सा फुर्तीला आंजनेय भी. सभी लडकियाँ घरों में माताओं के साथ हैं. लेकिनदो जिद्दी घुमक्कड़ लड़कियां साथ हैं. दोनों कभी घर में नहीं रह सकतीं. दोनों हमारी हर यात्रा में साथ चलती हैं. इनके नाम याद है न. जीभा और भाषी. इस यात्रा के नियमित यात्री तो जानते हैंकिन्तु यदि आप इस यात्रा में पहली बार आयें हैं तो बता दूं कि जीभा और भाषी लगातार बोलती रहती हैं. एक दूसरे के बोले हुए शब्दों को दोहराते रहना ही इन दोनों का मन-पसंद खेल है। लेकिन हर बार पहला शब्द दोहराते हुए ये एक गलती कर देती हैं. मुझे जीभा-भाषी का शब्दों से खेलना बहुत अच्छा लगता है. इससे पुरखों के साथ मेरी यात्रा बहुत रोचक हो जाती है.         

पौ फटने तक वानर टोली राज्यन की आफलबाड़ी की बाड़ के बाहर आ पहुँचि है. सभी जुगत लगा रहे हैं कि बिना पकड़े जाये, अन्दर कैसे पहुँचा जाए. लेकिन आंजनेय अधीर है. औरों कि तरह उसकी दृष्टि बाड़ में हुए किसी खण्ड या छेद को नहीं डूंड रही. वह तो पेड़ों की पत्तियों में छुपे फलों को डूंड रहा है. रवि (सूरज) उग रहा है. लाल रंग का बाल-रवि पेड़ों की हिलती-डुलती पत्तियों के बीच से झाँक रहा है. इन्हीं पत्तियों के बीच आंजनेय को पके हुए मीठे रूबी-फल (लाल फल) दिख गए हैं. ये देखो, अधीर आंजनेय ने दौड़ कर एक लम्बी और ऊँची छलांग लगायी और सीधा पेड़ पर. अभी आंजनेय ने पहला मधुर रवि-फल तोड़ कर मुँह में डाला ही है कि राज्यन स्वयं वहां आ पंहुचा है. राज्यन ने आंजनेय को देखा और अपना वेत्र (बैंत की छड़ी) घुमा कर दे मारा. वेत्र आंजनेय की हनु (ठोढ़ी) पर जा लगा. आंजनेय सीधे धरती पर गिरा. उसकी हनु (ठोढ़ी) पर चोट आयी है, लेकिन अगले ही पल उसने उठकर बिजली की फुर्ती से बगीचे की बाड़ के ऊपर से छलांग मारी और राज्यन की पहुँच से बाहर हो गया. इससे पहले कि राज्यन के बगीचे के रखवाले उनके पीछे पड़ते, पूरी वानर टोली दौड़ कर अपने अड्डे पर पहुँच चुकी थी, और बच्चे अपनी माताओं को पूरी कथा सुना रहे थे.

“माँ माँ! आंजनेय ने मधुर रूबी-फल देखा. उसने उछल कर रूबी-फल को मुँह में निगल लिया. राज्यन ने वेत्र फेंका जो उसके हनु पर लगा.

आंजनेय के हनु पर चोट लगी है. उसका हनु बहुत सूज गया है. माता लेप लगाने के लिए आग्रह कर रही है. किन्तु आंजनेय उत्तेजित और रोमाञ्चित है.  हनु (ठोढ़ी) पर राज्यन के वेत्र का वार पड़ते ही आंजनेय के मस्तिष्क में एक क्रान्तिकारी विचार कोंध गया है. आगे चल कर, यही विचार वानरों को रोज-रोज की इस छापेमारी और पकडे जाने के डर से मुक्ति दिलाने वाला है. इसके साथ ही वानरों और आफलों के बीच होने वाली लड़ाई भी समाप्त करने वाला है. सूजे हुए हनु को हाथ से पकड़े हुए, आंजनेय ने माता अंजना के पति और अपने पालक-पिता, लम्बे और घने बालों वाले केशरी से कहा,                    
“पिताजी, हम वानर भी क्यों वन-वन भटकें. हम क्यों आफलों से डर-डर कर जियें. हमें भी आफलों की तरह अपनी फलबाड़ी उगानी चाहिए. हमें भी उन्हीं की तरह फलबाड़ी-गृह में रहना चाहिए”.
आंजनेय की बात में दम है. वानरों की अपनी फलबाड़ी की संभावना से ही केशरी का मन-तन रोमांचित हो गया. उसकी छाती गर्व से फूल रही थी क्योंकि उसके पुत्र के विचार से वानरों का जीवन सदा के लिए बदलने वाला है.
“तुम्हें यह विचार पहले क्यों नहीं आया, आंजनेय? हमें भी यह विचार पहले क्यों नहीं आया, वानरों? हाँ हम अपनी फलबाड़ी उगायेंगे. फिर कोई कभी भूखा नहीं सोयेगा.”  
ख़ुशी में, सभी मुँह से किल-किल, खिल-खिल, गिलगिल की आवाज़ कर रहे हैं. सभी तालियाँ बजा रहे हैं.
अब तक माता अंजना पुत्र आंजनेय के हनु पर लेप लगा चुकी हैं. पीली हल्दी के लेप से आंजनेय का हनु और भी उभर कर दिख रहा है. आँखे, नाक और कान सभी फूले हुए हनु के सामने छोटे लगते हैं. उसका पूरा मुख केवल हनु-वान हो गया है.
बली ने कहा, “आंजनेय, आज से तुम्हारा नाम हनु-वान!” वह जोर से हँसा 
आंजनेय ने बली को गुस्से से देखा.   
आंजनेय के क्रान्तिकारी विचार ने वानरों में नयी उर्जा भर दी है. बली की अप्रिय बात सुनकर भी केशरी को कविता सूझ रही है.   
“वेत्र लगा हनु में, मुख हुआ हनुवान.
चमक लगी मन में, शिर हुआ ज्यानवान (ज्ञानवान)”.
मेरे आंजनेय का नाम हनुवान नहीं. इसका नाम है ज्यानवान  
टोली ने फिर खिल–खिल, गिल-गिल का शोर किया.   
“ज्यानवान. हाँ भाई, आज से हम आंजनेय को ज्यानवान ही कहेगें. जाम्बवान ने कहा. 

मुझे जोर की भूख लगी है. किन्तु लगता है कि वानर टोली के लोग इस समय भूख को भूल चुके हैं, क्योंकि अब वे फलबाड़ी लगाने का विमर्श करने में व्यस्त हो गए हैं. शुक्र है कि यह विमर्श अधिक देर नहीं चला, और सभी एक बार फिर आफलबाड़ी की और कूच कर रहे हैं.

लेकिन इस सभी वार्तालापों को सुनकर, जीभा और भाषी का शब्दों का खेल शुरू हो गया है. वह नहीं जानतीं इस खेल में बोले और सुने शब्दों में आने वाली सदियों में शब्दों में होने वाले परिवर्तनों की ध्वनियाँ सुनी जा सकती हैं, और इनके बोले अनेक शब्द अनेक भाषाओँ में प्रयोग होने वाले हैं. शब्दों में होने वाले बदलावों के कारण हमारे पूर्वजों की गाथाएँ अविश्वसनीय कथाओं में बदलने वाली हैं. 

जीभा ने वानर-वार्ता को दोहराना शुरू किया, "उसने उछल कर रूबी फल को खाया."
भाषी ने टोका. "नहीं, उसने उजल कर रवि फल को खाया"
जीभा, "नहीं, उसने उजर कर रवि बल को खाया"
भाषी, "नहीं, उसने उयर कर रवि बाल को खाया"
जीभा "नहीं, उसने उयड़ कर रवि बाल को खाया"
भाषी "अरे नहीं, उसने उड़ कर बाल-रवि को खाया" 
दोनों मिल कर हँसी " आंजनेय ने उड़ कर बाल-रवि को खाया."       
"आंजनेय ने उछल कर रूबी फल को खाया." का सत्य अब "आंजनेय ने उड़ कर बाल-रवि को खाया" की गप्प में बदलने जा रहा था.  

जीभा और भाषी का खेल जारी था... 
जीभा अपने गालों को फुला कर हवा बाहर छोड़ते हुए और उँगली से फूला गाल दिखाते हुए बोली -- फू
भाषी ने उसमें एक व्यंजन जोड़ा – फूर
जीभा बोली -- फूल
भाषी बोली— फल     
और इस तरह शब्दों का खेल चल पड़ा....
फल
बल (फल यानी जो फूला हुआ है. बलशाली मांसल होता है, और निर्बल पतला)
बली (बलशाली, राक्षसों का एक राजा) 
बाली (वानरों का राजा, सुग्रीव का बड़ा भाई).    
बली
बुली
बुल्ली bully [अँग्रेज़ी] = दबंग, धौंस जमाने वाला या धौंसिया
.........
फल
आफल
आफ्फल
अप्फल Apfel [जर्मन] = सेब 
अप्पल apple [अंग्रेजी] = सेब 
....
फल
आफल
आमल
आमर
आम्र [संस्कृत] = आम 
अमर = देवता
.......
आफल
आफलबाड़ी (फलों का बग़ीचा; फलों के बग़ीचे में घर)
आफरबाड़ी
आमरबाड़ी
अमराबाड़ी  
अमरावाडी
अमरावती (= इन्द्रलोक, स्वर्ग)
.....
ज्वल (= आग) > जेवेल jewel > जेवर
ज्वर = गर्मी बुखार 
ज्यर
जार
ज़ार
राज
राजन
राज्यन
यनजर
यनदर
इनदर
इन्द्र (= देवताओं का राजा)
....
ज्वल
लवज
रवज
रवय
रवि 
रबि
रूबी ruby
रूपी > रूप 
रुपे
पेरू [संस्कृत] = अग्नि, सूर्य
...
रूप
रूप्य
रुपया
....
ज्वल
ज्यर
स्यर
सूर्य
सूर्यज
सुजर्य
सुगर्य
सुगर्व
सुग्रीव (सुग्रीव का पारंपरिक अर्थ सुन्दर ग्रीवा (गर्दन) वाला है).   
.....
मृ   [संस्कृत] = मर, मार, हत्या
मर
मार
मारत
मारतय
मार्त्य [संस्कृत] = मारने वाला 
मार्यत
मरुत (एक प्रकार के वीर सैनिक) 
मारुति (= मरुत पुत्र, हनुमान) 
....
वेत्र (बैंत की लाठी) 
वेद्र
वेज्र
वज्र (इस कहानी में मैंने वज्र का अर्थ बिजली नहीं लिया गया है) 
....

वन
वनर
वानर
....
ज्वल = आग
चवल
कवल
कबल
कपल
कपिल (बन्दर के रंग या ताम्बे के रंग जैसा भूरा) 
कपिर
कपिः
.....
कपिल (बन्दर के रंग या ताम्बे के रंग जैसा भूरा) 
कोपर 
कोप्पर copper 
.....
कपिल 
कपिर (बन्दर) 
कापिर
काफ़िर
....
शिर
शिरय
शियर
हियर
हेयर hair
....
शिर
शिरय
शियर
शिरयक
कयशिर
केशिर
केशरी (हनुमान जी के पालक पिता, शेर को भी केशरी कहते हैं)  
केशर
....
ज्यानवान
ह्यानवान
हयानवान
हनायवान
हनुवान
हनुबान
हनुमान  
....
किलकिल
खिलखिल
गिलगिल
गिगिल्ल
गिग्गिल giggle    

......
हनुमान जी की कथा की मेरे द्वरा की गई यह व्याख्या पूरी तरह से काल्पनिक है. इसे पढ़ने के बाद आप ही बताइये कि 

"आंजनेय ने उछल कर रूबी फल को खाया"

या 

"आंजनेय ने उड़ कर बाल-रवि को खाया" 
...........
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