Wednesday, October 22, 2014

दीवाली हो, फिर भी बर्थडे पर मोमबत्ती क्यों बुझाते हैं? Blowing out candles on birthday even if it is Diwali

मान लीजिये कि आप दीवाली को पैदा हुए थे और अपना बर्थडे भी शुभ दिन दीवाली को ही मनाते हैं। इस साल 2014 ई॰ में दीवाली 23 अक्तूबर को है। अतः प्राचीन भारतीय पंचांग के अनुसार आप का बर्थडे इस साल दीवाली वाले दिन 23 अक्तूबर 2014 को सूरज उगने से शुरू होगा। लेकिन यदि आप 23 अक्तूबर को पैदा हुए थे तब अंतर्राष्ट्रीय मानक पंचांग के अनुसार 22 अक्तूबर की आधी रात 12 बजे 23 अक्तूबर शुरू हो जाएगा। 23 अक्तूबर को जन्म दिवस वाले अनेक बच्चे और बड़े 22 की रात के 12 बजे मोमबत्तियाँ बुझा कर और केक काट कर अपना बर्थडे मनाएंगे। अनेक हिन्दू पुनरुत्थानवादी नेताओंराष्ट्रवादियोंऔर शिक्षा बचाने की ध्वजा उठाने वालों को बर्थडे पर मोमबत्तियाँ बुझाना पसंद नहीं है। कारण स्पष्ट है-- प्रकाश ज्ञान और विवेक का प्रतीक हैंअंधकार अज्ञान और अविवेक का। फिर शुभ दिन को प्रकाश बुझाना अशुभ है। सही बात हैभारतीय परंपरा में तो हर शुभ काम दीपक जलाने से ही शुरू करते हैंचाहे उस समय आसमान पर सूरज क्यों न चमक रहा हो। ओलंपिक खेलों में भी लाखों वाट की रोशनी से जगमगाते स्टेडियम में मशाल से एक विशाल ज्योति जलाई जाती है। हम यह जानना चाहते हैं कि बर्थडे में मोमबत्ती बुझाने की यह ‘अशुभ’ परंपरा कहाँ से आयीचलिये एक बार फिर पुरखों के साथ एक काल्पनिक यात्रा को चलते हैं और देखते हैं कि बर्थडे को दीपक बुझाना कैसे शुरू हुआ होगा।    

हम हजारों साल पीछे पहुँच गए हैं। हमारे भील-शिकारी घुमंतू पुरखों ने अभी दुनिया के पहले गाँव बसाये हैं। घुमंतू पुरखे प्रायः कंदमूल और फल ही खाते हैं। लेकिन गाँव बसाने के बाद खाना भी पकाने लगे हैं। खाना पकाना कोई आसान काम नहीं हैं। इसके लिए आग जलाना काफी नहीं हैआग जलती रहे उसके लिए लगातार ईंधन डालना पड़ता है। आग को हवा देनी होती है। जलता हुआ चूल्हा मानव समाज के लिए एक बहुत बड़ी तकनीकी उपलब्धि है। पकाने के लिए बर्तन भी चाहियेँ। गाँव में एक बच्चा है। नाम है राजू। राजू की माँ रोज चूल्हा नहीं जला पाती। किन्तु कल राजू का हॅप्पी बर्थडे है। अतः आज चूल्हा जरूर जलेगा। हमारे पुरखे जन्म दिन याद रखते हैं। उन्हें सूरजचाँदचाँद की कलाओंऔर तारों की स्थितियों को देखते रहने से जन्म दिन याद रहता है। वास्तव में जन्म का दिन तो नहीं उसके पास वाली पूर्णिमा या अमावस ठीक याद रहते हैं। अधिकतर लोग जन्म दिन पूर्णिमा को मनाते हैं। राजू की माँ उसके जन्म दिन पर हमेशा हलवा केक बेक करती है / पकाती है। राजू को अपने जन्म दिन का इंतजार रहता है। उसे हलवे का इंतजार रहता है। माँ राजू के जन्म दिन से पहली रात को हलवा पका चुकी है। राजू उसे रात को ही खाना चाहता है। लेकिन राजू को सुबह तक इंतजार करना होगा। तिथि सूरज उगने से शुरू होती है। अतः जन्म का दिन तो सुबह है। आज की रातराजू को नींद नहीं आ रही। राजू दिये जला कर बैठा है। लकड़ी की तीलियों की नोक के ऊपर जंगली-अरंडी के पौधों के तैलीय बीज लगे हैं। हर बीज बहुत देर जलेगा। यही दुनिया के पहले दीपक हैं। राजू सारी रात लगातार हलवे के बर्तन को देख रहा है।  बार-बार हलवे के बर्तन के चक्कर लगा रहा है। आखिर किसी तरह पौ फूटी। सूरज उगने को है। राजू का बर्थडे आ गया है!

माँसुबह हो गयी। अब मैं हलवा-केक खा लूँ?”
हाँ बेटापर पहले दिये तो बुझा ले। ये दिये कल रात को फिर काम आएंगे। ज़ोर से फूँक मार।
राजू ज़ोर से फूँक मार कर सारे दिये बुझाता है। और अपना बर्थडे केक काटता है। राजू की बहनें जीभा और भाषी भी जग गईं हैं। माँ सभी को हलवा केक खिलाती हैं।

माँ गाती है: शुभ प्रज दिव राजू s s s s !   

दिये बुझानेकेक काटने और मंगल गाने की परंपरा अब भी जारी है। 
    
जीभा और भाषी हलवा केक खाने के बाद फिर से शब्दों का खेल में जुट जाती हैं। आइये सुनें वह क्या खेल रहीं हैक्योंकि यह खेल मानव समाज की भावी पीढ़ियाँ आने वाली कई सदियों में खेलने वाली हैं ---  
·       प्रज > पर्ज > पर्द > बर्द > बर्थ
·       दिव > देय > दे > डे
·       शुभ > हुभ > हुप > हपु > हपी > हॅप्पी
·       शुभ प्रज दिव > हॅप्पी बर्थ डे 
·       ज्वाला च्वाला > च्याला > चहाला > चूल्हा
·       ज्वाला ह्वाला > हवला > हलवा
·       ज्वाला ज्वालाई > हवालइ > हलवाई
·      ज्योतिर च्योतिर > क्योतिर > क्योतिल > क्योदिल > क्यांदिल > कंदील > कैन्डल 
·       पाकः (पकाना) > पाके > बाके > बेक 
·       पाकः > पाककः / पाकुकः (रसोइया) > कुक cook > केक cake  
भारतीय समय गणना और परंपरा में नया दिन नए सूरज के उगने से शुरू होता है। वास्तव मेंएक समय ऐसा था जब पूरी दुनिया में यही व्यवस्था चलती थी। उस प्राचीन समय के भारत की कल्पना कीजिये जब ज्ञान-विज्ञान का सूर्य केवल भारत में ही उगा था। जब भारत में सुबह सूरज उगता थायानी नई तिथि/ नया दिन / शुरू होता थाउस समय इंग्लैंड और पश्चिम यूरोप में लगभग आधी रात होती थी। मैं नहीं जानता कि क्या आधी रात को नई तिथि बदलने के पश्चिमी रिवाज का सम्बंध इस बात से था कि पश्चिम में आधी रात के समय भारत में सूरज उगता था और तिथि बदलती थी!*

सूरज हर दिन अलग समय पर उगता हैअलग समय पर अस्त होता है। अतः प्राचीन पंचांग के मानने वालों के लिएएक ही स्थान पर रहते हुए भीहर दिन का आरंभ अलग समय पर होता था / हैऔर अंत भी अलग समय पर। अगर किसी देश में आधी रात को नई तिथि आरंभ करनी है तब आधी रात (यानी सूरज छिपने से ले कर सूरज उगने के समय का ठीक आधा) भी हर रोज अलग समय पर होगी। अतः नई तिथि शुरू होने के लिए कोई मानक समय की आवश्यकता रही होगी। आधुनिक समय मेंसमय का अंतर्राष्ट्रीय मानकीकरण हुआ है। पूरी दुनिया में कहीं भी सूरज कभी छिपेकभी उगेलेकिन हर समय ज़ोन में आधी रात वहाँ के 12 बजे मानी जाती हैऔर उसी समय से नई तिथि भी शुरू हो जाती है। 
बर्थडे पर कोई दीपक जलाए या मोमबत्ती बुझायेबर्थडे रात के 12 बजे मनाये  या फिर सूर्योदय परइससे न हमारे देश को कोई हानि है न धर्म को कोई खतरा है। जैसे बंदरिया अपने मरे हुए बच्चे को हफ्तों छाती से चिपकाए रहती हैउसी तरह मानव मन बस यूं ही बेकार की पुरानी परम्पराओं को चिपकाए चलता है ये कालग्रस्त परम्पराएँ जन्ममरणविवाह के समय होने वाले कर्मकांड भी हो सकते हैभारत-पाक वागाह सीमा पर रोज शाम होने वाली शत्रु को आँख दिखाने की रस्म भी हो सकती हैसंसद के बजट सत्र में आने के लिए राष्ट्रपति की घोड़ा-बग्घी की सवारी भी हो सकती हैया राष्ट्रपति की लिमोसीन कार को घेरे घुड़सवार अंगरक्षक भी। हमारे अंगों और मन से चिपके सांस्कृतिक चीथड़ों की सूची बहुत लंबी है। लेकिन फटे-पुराने देसी चीथड़ों को चिपकाए रखने का आग्रह और किसी भी तरह के विदेशी चीथड़ों का विरोधकिसी स्वस्थ मानसिकता के लक्षण नहीं हैं।         

*शायद आपको याद हो कि आजादी के 52 साल बाद भी भारत की संसद में एक ब्रिटिश परंपरा लागू थी। 1999 तकहर वर्षबजट शाम को 5 बजे पेश किया गया। ऐसा इसलिए किया जाता था क्योंकि अंग्रेजों के समय में लंदन में दिन के 12 बजे वहाँ की संसद का सत्र शुरू होता था। उस समय भारत में शाम के 5 बजते हैं। लंदन और दिल्ली में बजट एक साथ पेश हो। इसलिए दिल्ली में शाम को बजट शाम को 5 बजे पेश होता था। अंग्रेज़ 1947 में भारत से चले गए पर हम बिना सोचे 52 साल बाद तक उनका आदेश मानते रहे! कभी भारत में तिथि सूर्योदय पर बदलती थी और लंदन में उस समय आधी रात होती थी। क्या आधी रात को तिथि बदलने की आधुनिक व्यवस्था का अर्थ है कि यूरोप की अवचेतन स्मृति में वह पुरानी भारतीय व्यवस्था अब भी मौजूद है??   

Friday, October 17, 2014

प्राचीन भूगोलवेत्ता -1. जापान और ताइवान संस्कृत के शब्द द्वीपानि के अपभ्रंश हैं Ancient Geographers-1. Japan and Taiwan are derived from Dweepani, the Sanskrit word for Islands

English version at the end of the text in Hindi 
कल्पना कीजिए कि आप प्राचीन भारत के खोजी समुद्री यात्रियों के साथ सुदूर समुद्रों में नए द्वीपों की खोज कर रहे हैं। हमारे ये पुरखे नए खोजे गए द्वीपों को क्या कह रहे होंगे? जाहिर है, वे इन्हें संस्कृत शब्द द्वीप या उसके बहुवचन द्वीपानि कह रहे होंगे। अब जरा द्वीप और द्वीपानि शब्दों को ताइवान और ताइपे (ताइवान की राजधानी) और जापान से मेल करें। इसके लिए आप ध्वनियों की सारणी में दिये गए अनुमेय परिवर्तन (permissible mutation) के अनुसार ही चलें। जैसे  द > ज (विद्युत > विज्युत; द्युति > ज्योति); > ; > य    

द्वीपानि
त्वीबानी
त्यीवानी 
ताइवान 

द्विपे 
त्वीपे 
त्यीपे 
ताइपे (ताइवान की राजधानी) 
-------------------
द्वीपानि
ज्यिपानि
ज्यापान
जापान 
जापान.जापान
यापान.यापान
पानयापान  
पान्यापान
न्याप्पान
निप्पॉन  
निपों
निफों
निहों
दुनिया भर के शब्दकोश और विश्वकोश तो जापान, निप्पॉन, ताइवान, और ताइपे शब्दों के उत्स पर कुछ और ही कहते हैं। इसमें मैं क्या कर सकता हूँ?      

Ancient Geographers-1.  Japan and Taiwan are derived from Dweepani, the Sanskrit word for Islands

Imagine that you were sailing with the ancient Indian voyagers and discovering new islands in deep oceans. What would our ancestors said when they found islands in deep ocean? Obviously, they would call it dvIpa, the Sanskrit word for island, or dvIpani (the plural of dvIpa). Now match the words Japan, Taiwan and Taipei (capital of Taiwan) with dvIpani (plural of  dvIpa) and allow for permissible mutations given in the periodic table of sounds; e.g. in many Sanskrit words,  d  changes to j as in vidyut विद्युत to vidjut विद्जुत or dyuti द्युति to jyoti ज्योति.

Dvipani
Tvibani
Tyivan
Taiwan

Dwipa
Twipe
Taypei
Taipei

Dvipani
Jyipani
Jyapan
Japan
JapanJapan
YapanYapan
Panyapan
Nyappan
Nippon
Nipon
Niphon
Nihon


However, the dictionaries and encyclopedias have entirely different theories about the origin of the words Japan, Nippon, Taiwan and Taipei. What can I do about that?  

Sunday, October 12, 2014

क्या रावण के दस सिर और बीस हाथ थे ? Did Ravan have ten heads and twenty hands?


क्या रावण के दस सिर और बीस हाथ थे? नहीं, निश्चय ही नहीं; क्योंकि मानव शरीर एक परिपूर्ण रचना है, और दस सिरों की बात छोड़िए एक की जगह दो सिर भी इस शरीर रचना के डिज़ाइन में फिट नहीं हो सकते। गर्भावस्था में किसी गड़बड़ी के कारण, अगर कोई दो सिर वाला बच्चा पैदा हो जाता है, तो वह अधिक दिन नहीं जीता। तो फिर रावण के दस सिरों का क्या रहस्य हैदस-सिर और बीस हाथों वाले रावण की यह रोमांचक कहानी हम भारतीयों को बचपन में दूध के साथ ही पिला दी जाती है। रावण को हम दशानन कहते हैं और दशहरे के दिन रामलीला में रावण के दस सिर वाले पुतले को जलते हुए देखने का आनंद लेते हैं। वास्तव में रामलीला की परंपरा लगभग 450 वर्ष पुरानी है। सबसे पहले गोस्वामी तुलसीदास ने काशी में रामलीला शुरू की थी। यह रामलीला उनके द्वारा लिखे ग्रंथ श्रीरामचरितमानस पर आधारित थी। आज भी यह परंपरा जारी है। तुलसी रामायण में राम-रावण युद्ध में राम बार-बार रावण के सिर काटते हैं, लेकिन हर बार कटे हुए सिर के स्थान पर नया सिर उग जाता है। अंत में राम को बताया जाता है कि रावण की नाभि में अमृत है, जब तक वह अमृत नहीं सूखेगा, तब तक रावण के कटे हुए सिर फिर उगते रहेंगे। राम तीर मार कर पहले रावण की नाभि का अमृत सुखाते हैं, तब जा कर रावण को मार पाते हैं! यही रोचक कहानी अभी तक चल रही है। इसे इस तरह समझा जा सकता है कि सुपरमैन, स्पाइडरमैन, बैटमैन जैसे मायावी मनुष्य न थे, न होते हैं, न होंगे, फिर भी हम रोमांचक मनोरंजन के लिए उन्हें पसंद करते हैं। समस्या यह है कि हम सुपरमैन, स्पाइडरमैन आदि की आधुनिक कहानियों को सच नहीं मानते, किन्तु रामायण के अलौकिक प्रसंगों को पूरी धार्मिक श्रद्धा के साथ सच मानते हैं! उन पर अविश्वास करने का तो प्रश्न ही नहीं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर भगवान अवतार लेते हैं, तो उन्हें भी लीला करते हुए, प्रकृति के नियमों का पालन करना पड़ता है। भगवान रोते हैं, उन्हें चोट भी लगती है, वे मूर्छित भी होते हैं, और दवा समय पर न पहुँचने पर भगवान की जान को  भी खतरा होता है। किन्तु जरा सोचिए कि अगर प्रकृति के नियम भगवान पर भी लागू होते हैं, तो फिर राक्षसों को उनसे कैसे छूट मिल सकती है? सबसे पहली रामायण महर्षि वाल्मीकि ने लिखी। माना जाता है कि वाल्मीकि श्री राम के समकालीन थे। तुलसी रामायण उसके हज़ारों साल बाद लिखी गयी, और इस बीच सैकड़ों पीढ़ियों में कहते-सुनते मूल कथा में बदलाव आते रहे। सबसे प्राचीन वाल्मीकि रामायण को पढ़ने से कुछ रोचक बातें सामने आती हैं। वाल्मीकि जी ने रावण के लिए अनेक शब्दों का प्रयोग किया है -- रावणलंकेश, लंकेश्वर, दशानन, दशग्रीव, शकंधरराक्षससिंहरक्षपतिराक्षसाधिपम्राक्षसशार्दूलम्, राक्षसेन्द्रराक्षसाधिकम्, राक्षसेश्वरः, लंकेश, लंकेश्वर। कुछ गिनती के स्थानों को छोड़ कर लगभग जहाँ कहीं भी वाल्मीकी ने रावण के लिए दस-सिर सूचक -- दशानन, दशग्रीव या दशकंधर जैसे शब्दों का प्रयोग किया है, वहाँ हम पाते है कि रावण अपने मंत्रियों से घिरा हुआ बैठा है। प्रायः अन्य स्थानों पर रावण के लिए राजन, रावण, राक्षसेंद्र, लंकेश, लंकेश्वर शब्दों का प्रयोग हुआ है। वाल्मीकि रामायण में अनेक प्रसंगों में रावण के मंत्रियों के नाम बिखरे हैं। रोचक बात है कि रावण की मंत्रिपरिषद् में नौ मंत्री है (नवरत्न परंपरा!) और ये सभी मंत्री रावण के भाई, भतीजे, मामा, नाना आदि सगे रिश्तेदार है -- 


1. कुंभकर्ण (भाई), 2. विभीषण (भाई), 3. महापार्श्व (भाई), 4. महोदर (भाई),  5. इंद्रजित (बेटा), 6. अक्षयकुमार (बेटा), 7. माल्यवान (नाना का भाई), 8. विरूपाक्ष (माल्यवान का बेटा, रावण का सचिव), और 9. प्रहस्त (मामा, प्रधान मंत्री)।  
बहुत संभव है कि ये सभी मंत्री जो निकट के रिश्तेदार थे, शायद देखने में भी एक जैसे लगते होंगे! यानी रावण सभा में एक नहीं दस रावण दिखते होंगे! जब रावण की घायल बहन शूर्पनखा रावण की राज्य सभा में जाती है, तो वाल्मीकि लिखते हैं कि रावण मंत्रियों से घिरा बैठा था। "उसके बीस भुजाएँ और दस मस्तक थे" विंशद्भुजं दशग्रीवं दर्शनीयपरिच्छदम् (वा॰ रा॰ 3/32/8)। नाक-कान काटे जाने से आहत एक बहन जब अपने एक भाई को शत्रु से बदले के लिए उकसाने के लिए जाती है, तो महल में एक के स्थान पर दस भाई-भतीजों को देख उसे स्वाभाविक ही अपनी रक्षा के तैयार दस सिर और बीस भुजाएँ दिखती हैं। इसी तरह जब हनुमान को बंदी बना कर रावण की मंत्री परिषद के सामने पेश किया जाता है, तब हनुमान देखते हैं कि रावण के दस सिर हैं-- शिरोभिर्दशभिर्वीरं भ्राजमानं महौजसम्  (वा॰ रा॰ 5/49/6) किन्तु, यह बताना महत्वपूर्ण है कि इससे ठीक पहली रात को जब सीता की खोज कर रहे हनुमान रावण के अन्तःपुर में घुसते हैं, और रावण को पहली बार देखते हैं, तो वहाँ स्पष्ट रूप में, बिना किसी भ्रम केशयन कक्ष में सो रहे रावण का एक सिर और दो हाथ ही देखते हैं (वा॰ रा॰ 5/10/15)। वाल्मीकि ने वहाँ सोते हुए का रावण और उसके अंतःपुर का विस्तृत वर्णन किया हैं। पूरे अध्याय में वाल्मीकि ने एक बार भी रावण के लिए दशानन, दशकंधर, दशग्रीव जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया। इस अध्याय में रावण के  लिए शब्द हैं: राक्षसाधिपम्रावणंराक्षससिंहराक्षसशार्दूलम् (राक्षसों में शेर), राक्षसेन्द्र, राक्षसेश्वरः, रक्षःपतेः/ राक्षसपति,  राक्षसाधिकम्। 

रावण की नाभि में अमृत का रहस्य
तुलसी रामचरितमानस के अनुसार रावण की नाभि में अमृत कुंड था। अतः युद्ध के मैदान में जैसे ही रावण का कोई सिर कटता था, वैसे ही एक नया सिर उसके स्थान पर आ जाता था। मेरा निवेदन है कि हम नाभि का अर्थ शरीर में गर्भ नाल के निशान वाले स्थान को न माने। संस्कृत में नाभि के 18 अर्थ है, जिनमें एक अर्थ "निकट की रिश्तेदारी, बिरादरी, जाति आदि का समुदाय" भी है। शायद इस अर्थ का उत्स यह है की एक माता के सभी बच्चे गर्भ में किसी समय अपनी-अपनी नाभि-नाल से माता से जुड़े हुए थे। अतः वे नाभि या सनाभि कहलाते हैं। अतः 'रावण की नाभि में अमृतकुंड' का केवल इतना ही अर्थ लगाया जाना चाहिए कि जैसे ही रावण का कोई सिर कटता था यानी जैसे ही कोई मंत्री मरता था, तुरंत रावण के परिवार का कोई अन्य सदस्य उसका स्थान ले लेता था। इस तरह सिर कटते गए, नए सिर आते गए। जब राम ने सभी रिश्तेदार मंत्रियों-सेनापतियों का मार दिया, तब ही रावण और उसकी सेना का मनोबल गिरा और उसे मारा जा सका। वाल्मीकि रामायण में हमें रावण के उन तमाम रिश्तेदारों (उपमंत्रियों और सेनापतियों) की सूची मिलती है जिनसे समय-समय पर रावण ने मंत्रणा की या जिन्हें विशेष ज़िम्मेदारियाँ दी। रावण के ये वैकल्पिक सिर थे – त्रिशिरा (बेटा), देवांतक (बेटा), नरान्तक (बेटा)अतिकाय  (बेटा)कुम्भ (भतीजा -- कुंभकरण का बेटा)निकुंभ (भतीजा -- कुंभकरण का बेटा)जंबूमाली (मामा प्रहस्त का बेटा), दुर्मुख, वज्रद्र्न्ष्ट्र, वज्रहनु, शुक,  सारण, धूम्राक्ष, आदि।                                             दशानन और दशरथ
रावण की 1+9 मंत्रिपरिषद् की तरह राम के पिता और अयोध्या के राजा दशरथ की मंत्रिपरिषद् में भी नवरत्न व्यवस्था थी-- आठ मंत्री (वा॰ रा॰1/7/3), और एक पुरोहित थे। एक अतिरिक्त पुरोहित (वा॰ रा॰1/7/4) और आठ अतिरिक्त मंत्री (वा॰ रा॰ 1/7/5) भी थे। लेकिन रावण की व्यवस्था के विपरीत दशरथ के मंत्रियों में उनके किसी भी रिश्तेदार होने की सूचना हमें वाल्मीकि रामायण में नहीं मिलती। दशरथ का अर्थ 'दस रथों वाला' माना जाता है। किन्तु यदि दशानन / दशमुख का अर्थ 1+9 नवरत्न मंत्रियों वाला राजा है, तो हमें यह सोचना होगा कि क्या दशरथ का भी कोई वैकल्पिक अर्थ हो सकता है? संस्कृत में रथ शब्द के अनेक अर्थ हैं। रथ का प्रमुख अर्थ तो वाहन है, किन्तु रथ के अन्य अर्थों में 'शरीर', 'अवयव, ‘अंग’, ‘सदस्य’, योद्धा’, ‘नायक भी हैं। अतः दशरथ का अर्थ 'दस-सदस्य वाली (राज्य व्यवस्था)' भी हो सकता है! क्या उस युग के दो प्रमुख राज्यों अयोध्या और लंका में, अधिनायकवादी राजतंत्र से कुलीनतांत्रिक राजतंत्र में परिवर्तन के प्रयोग चल रहे थे। दशरथ के बाद का रामराज्य तो जनवादी राजतंत्र था ही।