Friday, October 23, 2026

ताण्डव शब्द कहाँ से आया?

भारत की प्राचीन नाट्य परंपरा में पुरुषों के नृत्य को ताण्डव और स्त्रियों के नृत्य को लास्य कहते हैं । आनन्द के साथ करने पर ताण्डव को 'आनन्द ताण्डव' कहते हैं और उग्र भावना के साथ करने पर इसे 'रौद्र ताण्डव' या 'रुद्रताण्डव' कहते हैं।


किन्तु आधुनिक लौकिक प्रचलन में ताण्डव का अर्थ सिमट गया है। अब भगवान शंकर द्वारा किये जाने वाले अलौकिक नृत्य को ही ताण्डव कहा जाता है। यह उग्रता, तीव्र गति, उत्तेजना और उन्माद से पूर्ण नृत्य है। नटराज रूप में शिव जी को ताण्डव नृत्य करते हुए दिखाया जाता है।

ताण्डव शब्द के उत्स पर भ्रम बना हुआ है। एक मत के अनुसार तण्डु नामक ऋषि ने सबसे पहले इसकी शिक्षा दी थी। इसी से इसका नाम ताण्डव हुआ । तण्डु ऋषि के विषय में बहुत सूचना नहीं मिलती। ऐसा माना जाता है कि तण्डु भगवान शिव के एक परम प्रिय गण थे। उन्होंने ही नाट्य शास्त्र के रचयिता भरत मुनि को यह नृत्य सिखाया। अतः इस नृत्य का नाम ताण्डव हुआ। कुछ लोग भगवान शिव के वाहन नन्दी को ही तण्डु मानते हैं।

मैं शब्दों के नैसर्गिक जैविक विकास और डार्विनवादी क्रम-विकास में रुचि रखता हूँ । मुझे शब्दों का डीएनए (DNA) खोजने और उनमें हुई म्यूटेशन (mutation) समझने में आनंद मिलता हैं। मेरी समझ में नाट्य शब्द ही ताण्डव का उत्स है।

नाट्य [संस्कृत] = नृत्य, रंगकर्म

अब हम नाट्य से पहले 'अति' उपसर्ग लगाते हैं जो बहुत, अधिक, अतिशय, अत्यधिक उत्कर्ष प्रकट करता है।

अति + नाट्य
= अतिनाट्य [संस्कृत] = नृत्य का उत्कर्ष या सबसे बढ़ी हुई अवस्था।
> अतिनाड्य
> अतिनाड्व
> तिनाड्व
> तानाड्व
> तानड्व
> ताण्डव [संस्कृत]

ताण्डव शब्द की व्युत्पत्ति का यह प्रस्ताव आपको कैसा लगा?