Monday, July 27, 2020

क्या आप भी 'श्रीरामचंद्र कृपालु भजु मन' गलत गा रहे हैं?

धार्मिक ग्रंथों के पन्ने अनेक बार बिखर कर गलत क्रम में आगे पीछे हो गए - 2. श्रीरामचंद्र कृपालु भजु मन

 

लेखक - राजेन्द्र गुप्ता


प्राचीन काल में धार्मिक ग्रंथ वृक्षों की छाल और पत्तों से बने पृष्ठों पर लिखे जाते थे। बाद में कागज पर लिखे जाने लगे। इन पृष्ठों आज की पुस्तक की तरह जिल्द में नहीं बांधा जाता था। इन्हें क्रम में लगाकर डोरी से बांधकर कपड़े में लपेट कर रखा जाता था। किन्तु ऐसा लगता है कि अनेक बार यह पृष्ठ बिखर जाते थे और किसी गलत क्रम में बांध दिए जाते थे। गलत क्रम में आगे-पीछे होने से कई बार कथा का अर्थ और संदर्भ बदल जाता था। 


आपने हनुमान चालीसा का पिछला उदाहरण पढ़ा। -- क्या आप भी हनुमान चालीसा गाने में एक बड़ी गलती कर रहे हैं? अब नया उदाहरण प्रस्तुत है। 


2. श्री राम स्तुति ।। 


'श्रीरामचंद्र कृपालु भजु मन' सबसे लोकप्रिय सबसे प्रसिद्ध राम भजन है। यह तुलसीदास जी की प्रसिद्ध पुस्तक विनय पत्रिका की 45वीं स्तुति है। विनय पत्रिका से इसका मूल पाठ और अर्थ इस लेख के अंत में दिया गया है ।


इस भजन को गाते हुए भक्त-गण एक विचित्र भूल करते हैं। वे भजन के बाद तुलसीदास जी के श्रीरामचारितमानस से एक छंद और एक सोरठा गाते हैं --

छंद 

मनु जाहि राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर सावरो । 

करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो ॥६॥

एही भांति गौरी असीस सुनी सिय सहित हिय हरषीं अली । 

तुलसी भावानिः पूजी पुनि-पुनि मुदित मन मंदिर चली ॥७॥


अर्थ:- जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही स्वभाव से ही सुंदर साँवला वर (श्रीरामचंद्रजी) तुमको मिलेंगे । वह दया का खजाना और सुजान (सर्वग्य) है । तुम्हारे शील और स्नेह को जानता है ॥६॥

इस प्रकार श्रीगौरीजी का आशीर्वाद सुनकर जानकीजी समेत सभी सखियाँ ह्रदय मे हर्षित हुई । तुलसीदासजी कहते हैं- भवानीजी को बार-बार पूजकर सीताजी प्रसन्न मन से राजमहल को लौट चली ॥७॥


सोरठा 

जानी गौरी अनुकूल, सिय हिय हरषु न जाइ कहि । 

मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे ॥८॥


अर्थ:- गौरीजी को अनुकूल जानकर सीताजी के ह्रदय में जो हरष हुआ वह कहा नही जा सकता । सुंदर मंगलो के मूल उनके बाये अंग फडकने लगे ॥८॥


ध्यान दीजिए कि 'श्रीरामचंद्र कृपालु भजु मन' विनय पत्रिका ग्रंथ से श्री राम की स्तुति है। इसके अंत में जो छंद और दोहा गाये जाते हैं  उनका  श्रीराम की स्तुति से कोई संबंध नहीं है। वे छंद और सोरठा  श्रीरामचरितमानस के बालकांड के उस प्रसंग से लिए गए हैं जहां सीता स्वयंवर से पहले सीता जी गौरी पूजन के लिए जाती हैं (बालकाण्ड दोहा 236)। ऐसा लगता है कि यह भी पूर्व काल में श्रीरामचरितमानस और विनय पत्रिका के पृष्ठों के बिखर जाने और उन्हें गलत जगह लगा दिए जाने का परिणाम है।


श्रीराम स्तुति का अंतिम पद है --

इति वदति तुलसीदास, शंकर शेष मुनि-मन-रंजनं । 

मम ह्रदय कंज निवास कुरु, कामादि खल-दल-गंजनं ॥५॥


इसके बाद 'मनु जाहि राचेउ मिलिहि सो बरु' इत्यादि गाना गलत है। ------------------------------------------------ *'श्रीरामचंद्र कृपालु भजु मन' का मूल पाठ (विनय पत्रिका से)*


श्रीरामचंद्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारुणं ।।

नवकंज-लोचन, कंज-मुख, कर-कंज पद कंजारुणं ।।१।।


अर्थ:- हे मन ! कृपालु श्रीरामचंद्रजी का भजन कर, वे संसार के जन्म-मरण रूप दारुण भय को दूर करने वाले है । उनके नेत्र नव-विकसित कमल के समान है । मुख-हाथ और चरण भी लालकमल के सदृश हैं ॥१॥


कंदर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरद सुन्दरम । 

पट पीत मानहु तडित रूचि-शुची नौमी, जनक सुतावरं ॥२॥


अर्थ:- उनके सौंदर्य की छ्टा अगणित कामदेवो से बढ्कर है । उनके शरीर का नवीन नील-सजल मेघ के जैसा सुंदर वर्ण है । पीताम्बर मेघरूप शरीर मे मानो बिजली के समान चमक रहा है । ऐसे पावनरूप जानकीपति श्रीरामजी को मै नमस्कार करता हूँ ॥२॥


भजु दीनबंधु दिनेश दानव दैत्य वंश निकन्दनं । 

रघुनंद आनंद कंद कोशल चन्द्र दशरथ नंदनम ॥३॥


अर्थ:- हे मन ! दीनों के बंधू, सुर्य के समान तेजस्वी, दानव और दैत्यो के वंश का समूल नाश करने वाले, आनन्दकंद, कोशल-देशरूपी आकाश मे निर्मल चंद्र्मा के समान, दशरथनंदन श्रीराम का भजन कर ॥३॥


सिर मुकुट कुंडल तिलक चारू उदारु अंग विभुषणं । 

आजानुभुज शर चाप-धर, संग्राम-जित-खर दूषणं ॥४॥


अर्थ:- जिनके मस्तक पर रत्नजडित मुकुट, कानों में कुण्डल, भाल पर तिलक और प्रत्येक अंग मे सुंदर आभूषण सुशोभित हो रहे है । जिनकी भुजाएँ घुटनों तक लम्बी है । जो धनुष-बाण लिये हुए है, जिन्होने संग्राम में खर-दूषण को जीत लिया है ॥४॥


इति वदति तुलसीदास, शंकर शेष मुनि-मन-रंजनं । 

मम ह्रदय कंज निवास कुरु, कामादि खल-दल-गंजनं ॥५॥


अर्थ:- जो शिव, शेषजी और मुनियों के मन को प्रसन्न करने वाले और काम, क्रोध, लोभादि शत्रुओं का नाश करने वाले है । तुलसीदास प्रार्थना करते हैं कि वे श्रीरघुनाथजी मेरे ह्रदय कमल में सदा निवास करे ॥५॥

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आभार इस लेख को लिखते समय मुझे तुलसी साहित्य के विद्वान और मेरे मित्र डा. अवनीजेश अवस्थी से विचार-विमर्श का लाभ मिला। उनका बहुत आभार।


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